आधार कार्ड की घातक असर समजिये रविश कुमार से

ravish kumar kon

आधार कार्ड से जुड़ा आपकी प्राइवेसी का मुद्दा अलज़ेबरा का सवाल नहीं है

“पूरा ब्लाक सिखों का था और जब 400-500 सिख इकट्ठे हों तो मजाल है कि कोई बाल भी बांका कर जाए। लेकिन इतने में मोहल्ले के बाहर भीड़ बढ़ने लगी और पत्थरों की बौछारें शुरू हो गई। पुलिस आई तो लगा कि अब बात बन जाएगी। पुलिस इस हिंसक भीड़ को तो यहां से हटाएगी। लेकिन क्या पता था कि कानून के रखवाले ही जान के दुश्मन बन चुके हैं। अब एस एच ओ शूरवीर सिंह त्यागी और चौकी इंजार्ज शर्मा आए और कहने लगे कि आप लोग इकट्ठे मत हो, अपने अपने घरों में चले जाओ। हमने खाकी वर्दी पर भरोसा कर लिया। जैसे ही पुलिस के कहने पर सिख अपने-अपने घरों में गए, वैसे ही पास के चिल्ला गांव से आई इस भीड़ ने फिर हमला बोल दिया। अब तो पुलिस भी उनके साथ थी। इन्होंने घरों के पानी के पाइप तोड़ दिए, बिजली की नंगी तारें करंट फैलाने के लिए घरों के अंदर फेंकनी शुरू कर दीं। अब भीड़ ने भाई समुद्र सिंह को देख लिया और कहने लगे कि इधर आ जाते बाल काल काट कर छोड़ देंगे। वहशियों ने उसे उठाकर दूसरी तरफ पटका और सरकार समुद्र सिंह को मार डाला। “

“शाम का ही वक्त रहा होगा कि पास रहने वाले नाइयों के घरों से कुछ लोग आए और कहने लगे कि आप डरो मत, घर में ही रहो, हमने घर के बाहर से ताला लगा दिया है। हमें कुछ समझ में नहीं आया। लगा शायद हालात बिगड़ते देख पड़ोसी अपना धर्म निभा रहे हैं। बाहर ताला लगा होगा तो दंगाई यह सोच कर लौट जायेंगे कि अब यहां कोई नहीं रहता। पड़ोसियों ने कितनी समझदारी का काम किया है। लेकिन ज़्यादा देर नहीं हुई थी कि भ्रम टूट गया। यही पड़ोसी अपने साथ भारी भीड़ लेकर आ धमके। अब समझ में आया कि ताला बाहर से इसलिए लगाया था कि कहीं कोई भाग न जाएं। “

ये दोनों प्रसंग जरनैल सिंह की किताब ‘कब कटेगी चौरासी’ से लिए हैं जिसे पेंगुइन ने 2009 में छापा था। पहली घटना दिल्ली के नंदनगरी की है और दूसरी घटना मयूर विहार के पास त्रिलोकपुरी की है। उस वक्त सिख विरोधी नरसंहार का कवरेज न के बराबर हुआ था इसलिए आप यह किताब पढ़ सकते हैं। एक तर्क दिया जाता है कि आज की तरह प्राइवेट न्यज़ चैनल नहीं थे मगर कई अख़बार तो वही थे जो आज हैं। पर पुलिस, जांच एजेंसी और न्यायपालिका तो वही थी जो आज है। फिर भी किसी साधारण या किसी बड़े को सज़ा नहीं मिली। राजनीति हमें दो चार नेताओं के पीछे घुमाती रही, वो तो बच ही गए उनके नाम पर तमाम तरह की भीड़ में आए आम हत्यारे भी बच गए।

(आधार कार्ड को समजने के लिए रविश कुमार का लंबा लेख है धीरज से रसप्रद लेख आगे पढ़िए ये जानना जरुरी है )

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