महेनत करके गरीबी से निकले बने 154 कारो के मालिक

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रमेश 7 साल के थे जब उनके पिता का देहांत हो गया। पिता अपने पीछे एक नाई की दुकान छोड़ कर गए थे।

रमेश की मां ने लोगों के घरों में खाना बना कर बच्चों का लालन-पालन किया।

रमेश की मां नाई की दुकान नहीं चला सकती थीं, इसलिए उन्होंने वह दुकान मात्र 5 रू पए प्रति दिन के हिसाब से किराए पर चढ़ा दी और रमेश को इलेक्ट्रॉनिक्स में डिप्लोमा करने के लिए प्रेरित किया।

वर्ष 1989 में रमेश ने पिता की नाई की दुकान को खुद चलाने का फैसला किया और उसमें सलून खोला।

उनकी दुकान अच्छी चलने लगी तब उन्होंने वर्ष 1994 में मारूति ओमनी गाड़ी खरीदी।

यह कार पर्सनल यूज के लिए ली गई थी, लेकिन ज्यादातर समय इसका इस्तेमाल नहीं किया जाता था। तब उनकी मां की एम्पलॉयर ने रमेश को सलाह दी कि वो यह कार इंटेल को लीज पर दे दें।

वह महिला इंटेल में नौकरी करती थी

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