न्यू यार्क चलने का संस्कार देखकर लगता है कि आप किसी ऑटोमेटिक शहर में है ।

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Gujju Post

न्यू यार्क को चलने का सलीका मालूम है । चलने का अंदाज़ इसका निराला है । कहीं कोई ट्रैफिक पुलिस नियंत्रण के लिए नहीं है । बत्तियाँ आपको चलाती हैं । लोग ट्रैफिक की बत्तियों का सम्मान करते हैं । ज़ाहिर है एक दिन में इस शहर ने ये सब नहीं सीखा होगा । लोग दूसरे को रास्ता देते हैं और दूसरे का इंतज़ार करते हैं । नज़र मिलती है तो मुस्कुराते हैं । किसी को रास्ता मालूम नहीं है । गूगल उन्हें चलाता है । किसी दिन जीपीएस फ़ेल हो जाए तो सारा शहर वहीं ठहर जाएगा । लोग अपने घर भी नहीं पहुँच पायेंगे ।

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सड़कों की व्यवस्था और चलने का संस्कार देखकर लगता है कि आप किसी ऑटोमेटिक शहर में है ।

कार वाले वहाँ पार्क नहीं करेंगे जहाँ स्कूल बस की पार्किंग का बोर्ड है । जहाँ आग बुझाने की पाइप है । एक भी अपवाद नज़र नहीं आया । जहाँ भी आग बुझाने की पाइप देखा वो जगह ख़ाली नज़र आई ।

हम भारतीय अपने शहरों में मौका देखकर ऐसी जगहों पर पार्क कर देते । इन सब कामों के लिए कोई पुलिस वाला धूप सर्दी  गर्मी और बरसात में नहीं खड़ा है । बिना पुलिस के किसी शहर का यह संस्कार चकित करता है ।

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आग के प्रति शहर किसी सैनिक की तरह सतर्क है । जिन  इमारतों में आपातकालिन रास्ते नहीं है वहाँ बाहर से लोहे की सीढ़ियाँ बनाई गई हैं । ज़रा सा संकेत मिलता है और सायरन वाली गाड़ियाँ दौड़ पड़ती हैं । पल भर में सब पहुँच जाते हैं । जान और माल की क़ीमत है । हमारे मुल्क में ये व्यवस्था और संस्कार हासिल करने में जाने कितने साल लग जायेंगे । पर यक़ीन होता है कि एक दिन होगा जरूर । इन व्यवस्थाओं से लोग मामूली झंझटों से आज़ाद हैं । कई स्कूलों के बाहर अस्थमा का बोर्ड लगा है जिसका मतलब है कि वहाँ निर्माण कार्य नहीं हो सकता । इतना बारीक ख़याल देखकर अच्छा ही लगा ।

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मेट्रो की व्यवस्था लाजवाब है और बेहद साधारण । हर गली और मोड़ से मेट्रो गुज़रती है । सौ साल पहले ही मेट्रो का जाल बिछ चुका था । लोग मेट्रो से निकलते हैं और दस क़दम चल कर अपने दफ्तर और दुकान के भीतर चले जाते हैं । बाहर भीड़ नज़र नहीं आती है । हमने भी दिल्ली में मेट्रो के जाल बिछाये हैं मगर जरूरत से ज़्यादा जगह की बर्बादी की है । अगर आप यहाँ आकर मेट्रो की योजना का अध्ययन करेंगे तो एक बार दिल्ली में मेट्रो बिछाने वालों को ठीक से समझ सकेंगे । श्रीधरण को कुछ ज्यादा ही बढ़ा चढ़ा कर पेश किया गया है । जबकि उनके पास दुनिया भर में मेट्रो के तमाम अनुभव मौजूद थे । न्यूयार्क जैसा दिल्ली में तो नहीं हो सकता था मगर दिल्ली मेट्रो को और बेहतर तरीके से बनाया जा सकता था । बहुत सारी जगहों को बर्बाद किया गया है । एक मामले में दिल्ली मेट्रो शानदार है । सफाई और चमकने में । न्यूयार्क का मेट्रो पुराना लगता है । गंदगी नजर आती है । काठ के पुराने बेंच लगे हैं । एक तरफ से कार्ड या टोकन देकर चेक इन कीजिये दूसरी तरफ से निकल जाइये । दिल्ली में दोनों तरफ क्यों टोकन देना पड़ता है, बात समझ में नहीं आई ।

एक और खास बात नजर आई । शहर के चप्पे चप्पे पर बिलबोर्ड नहीं लगे हैं । नेताओं के थोबड़े आपको होली दीवाली में स्वागत के नाम पर शहर को भद्दा नहीं बनाते हैं । अरे हाँ इतना सब कुछ होने के बाद भी न्यू यार्क की सड़कों में गड्ढे दिख जाते हैं । पैच वर्क का जुगाड़ यहाँ भी है !

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चलते चलते एक और बात । अमरीका की पुलिस बिना सायरन के नहीं चल सकती । दिन भर पुलिस की गाड़ी हनहनाते रहती है । ऐसा लगता है पुलिस यहाँ की सड़कों पर वीडियो गेम खेल रही है । गाड़ियों पर कुछ ज्यादा ही फ़्लैश लाइट लगी है । इनसे से तो अच्छी दिल्ली पुलिस है । दिल्ली पुलिस की जिप्सी चुपचाप आ जाती है । मगर न्यूयार्क की पुलिस सायरन के बिना कुछ भी नहीं । भाई इतना हल्ला करते आइयेगा तो चोरवा भाग नहीं जाएगा। मने कह रहे हैं !

-रवीश कुमार (NDTV) के ब्लॉग से 

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